मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाई गई फ़िल्मी ग़ज़लों का यह संग्रह उनकी मधुर और भावपूर्ण गायकी की खूबसूरत झलक प्रस्तुत करता है। इस पोस्ट में साहिर लुधियानवी, मिर्ज़ा ग़ालिब सहित अनेक प्रसिद्ध शायरों की ग़ज़लें शामिल हैं। प्रेम, विरह, दर्द और ज़िंदगी के अलग-अलग रंगों को समेटे ये ग़ज़लें आज भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय हैं। यहाँ आप मोहम्मद रफ़ी की मशहूर फ़िल्मी ग़ज़लों के बोल हिंदी में पढ़ सकते हैं।
इस पोस्ट में
- कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया : साहिर लुधियानवी
- बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे : मिर्ज़ा ग़ालिब
- न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ : मुज़्तर ख़ैराबादी
- मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए : मिर्ज़ा ग़ालिब
- मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया : साहिर लुधियानवी
- बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना : मिर्ज़ा ग़ालिब
- नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने : मिर्ज़ा ग़ालिब
- ग़ज़ब किया तिरे वा'दे पे ए'तिबार किया : दाग़ देहलवी
- दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ : मिर्ज़ा ग़ालिब
- है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और : मिर्ज़ा ग़ालिब
- ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है : मिर्ज़ा ग़ालिब
- दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ : साहिर लुधियानवी
- बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा : साहिर लुधियानवी
- मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली : कैफ़ी आज़मी
- दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए : मिर्ज़ा ग़ालिब
- न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए : साहिर लुधियानवी
- फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह : सुदर्शन फ़ाकिर
- छलके तिरी आँखों से शराब और ज़ियादा : हसरत जयपुरी
- कोई साग़र दिल को बहलाता नहीं : शकील बदायूनी
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया : साहिर लुधियानवी
कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आयाबात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं
बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया
कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त
सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे : मिर्ज़ा ग़ालिब
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगेहोता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
इक खेल है औरंग-ए-सुलैमाँ मिरे नज़दीक
इक बात है एजाज़-ए-मसीहा मिरे आगे
जुज़ नाम नहीं सूरत-ए-आलम मुझे मंज़ूर
जुज़ वहम नहीं हस्ती-ए-अशिया मिरे आगे
होता है निहाँ गर्द में सहरा मिरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मिरे आगे
मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तिरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मिरे आगे
सच कहते हो ख़ुद-बीन ओ ख़ुद-आरा हूँ न क्यूँ हूँ
बैठा है बुत-ए-आइना-सीमा मिरे आगे
फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार
रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मिरे आगे
नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा
क्यूँकर कहूँ लो नाम न उन का मिरे आगे
ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे
आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मिरा काम
मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे
ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते
आई शब-ए-हिज्राँ की तमन्ना मिरे आगे
है मौजज़न इक क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ काश यही हो
आता है अभी देखिए क्या क्या मिरे आगे
गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मिरे आगे
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ : मुज़्तर ख़ैराबादी
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँकिसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं
न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ
मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ
न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए : मिर्ज़ा ग़ालिब
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुएजोश-ए-क़दह से बज़्म चराग़ाँ किए हुए
करता हूँ जम्अ' फिर जिगर-ए-लख़्त-लख़्त को
अर्सा हुआ है दावत-ए-मिज़्गाँ किए हुए
फिर वज़'-ए-एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गरेबाँ किए हुए
फिर गर्म-नाला-हा-ए-शरर-बार है नफ़स
मुद्दत हुई है सैर-ए-चराग़ाँ किए हुए
फिर पुर्सिश-ए-जराहत-ए-दिल को चला है इश्क़
सामान-ए-सद-हज़ार नमक-दाँ किए हुए
फिर भर रहा हूँ ख़ामा-ए-मिज़्गाँ ब-ख़ून-ए-दिल
साज़-ए-चमन तराज़ी-ए-दामाँ किए हुए
बाहम-दिगर हुए हैं दिल ओ दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा ओ ख़याल का सामाँ किए हुए
दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए है
पिंदार का सनम-कदा वीराँ किए हुए
फिर शौक़ कर रहा है ख़रीदार की तलब
अर्ज़-ए-मता-ए-अक़्ल-ओ-दिल-ओ-जाँ किए हुए
दौड़े है फिर हर एक गुल-ओ-लाला पर ख़याल
सद-गुलसिताँ निगाह का सामाँ किए हुए
फिर चाहता हूँ नामा-ए-दिलदार खोलना
जाँ नज़्र-ए-दिल-फ़रेबी-ए-उनवाँ किए हुए
माँगे है फिर किसी को लब-ए-बाम पर हवस
ज़ुल्फ़-ए-सियाह रुख़ पे परेशाँ किए हुए
चाहे है फिर किसी को मुक़ाबिल में आरज़ू
सुरमे से तेज़ दश्ना-ए-मिज़्गाँ किए हुए
इक नौ-बहार-ए-नाज़ को ताके है फिर निगाह
चेहरा फ़रोग़-ए-मय से गुलिस्ताँ किए हुए
फिर जी में है कि दर पे किसी के पड़े रहें
सर ज़ेर-बार-ए-मिन्नत-ए-दरबाँ किए हुए
जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया : साहिर लुधियानवी
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गयाहर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया
बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया
जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उस को भुलाता चला गया
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना : मिर्ज़ा ग़ालिब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होनाआदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
गिर्या चाहे है ख़राबी मिरे काशाने की
दर ओ दीवार से टपके है बयाबाँ होना
वाए-दीवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझ को
आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना
जल्वा अज़-बस-कि तक़ाज़ा-ए-निगह करता है
जौहर-ए-आइना भी चाहे है मिज़्गाँ होना
इशरत-ए-क़त्ल-गह-ए-अहल-ए-तमन्ना मत पूछ
ईद-ए-नज़्ज़ारा है शमशीर का उर्यां होना
ले गए ख़ाक में हम दाग़-ए-तमन्ना-ए-नशात
तू हो और आप ब-सद-रंग-ए-गुलिस्ताँ होना
इशरत-ए-पारा-ए-दिल ज़ख़्म-ए-तमन्ना खाना
लज़्ज़त-ए-रीश-ए-जिगर ग़र्क़-ए-नमक-दाँ होना
की मिरे क़त्ल के बा'द उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशेमाँ का पशेमाँ होना
हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत 'ग़ालिब'
जिस की क़िस्मत में हो आशिक़ का गरेबाँ होना
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने : मिर्ज़ा ग़ालिब
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बनेक्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने
मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि बिन आए न बने
खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए
काश यूँ भी हो कि बिन मेरे सताए न बने
ग़ैर फिरता है लिए यूँ तिरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है तो छुपाए न बने
इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या
हाथ आवें तो उन्हें हाथ लगाए न बने
कह सके कौन कि ये जल्वागरी किस की है
पर्दा छोड़ा है वो उस ने कि उठाए न बने
मौत की राह न देखूँ कि बिन आए न रहे
तुम को चाहूँ कि न आओ तो बुलाए न बने
बोझ वो सर से गिरा है कि उठाए न उठे
काम वो आन पड़ा है कि बनाए न बने
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
ग़ज़ब किया तिरे वा'दे पे ए'तिबार किया : दाग़ देहलवी
ग़ज़ब किया तिरे वा'दे पे ए'तिबार कियातमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
किसी तरह जो न उस बुत ने ए'तिबार किया
मिरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया
हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया
तसल्लियाँ मुझे दे दे के बे-क़रार किया
ये किस ने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया
कि दिल से शोर उठा हाए बे-क़रार किया
सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया
अगर ये सच है तो बे-शुब्ह हम पे वार किया
न आए राह पे वो इज्ज़ बे-शुमार किया
शब-ए-विसाल भी मैं ने तो इंतिज़ार किया
तुझे तो वादा-ए-दीदार हम से करना था
ये क्या किया कि जहाँ को उमीद-वार किया
ये दिल को ताब कहाँ है कि हो मआल-अंदेश
उन्हों ने वा'दा किया इस ने ए'तिबार किया
कहाँ का सब्र कि दम पर है बन गई ज़ालिम
ब तंग आए तो हाल-ए-दिल आश्कार किया
तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादाँ कि ग़ैर कहते हैं
अख़ीर कुछ न बनी सब्र इख़्तियार किया
मिले जो यार की शोख़ी से उस की बेचैनी
तमाम रात दिल-ए-मुज़्तरिब को प्यार किया
भुला भुला के जताया है उन को राज़-ए-निहाँ
छुपा छुपा के मोहब्बत को आश्कार किया
न उस के दिल से मिटाया कि साफ़ हो जाता
सबा ने ख़ाक परेशाँ मिरा ग़ुबार किया
हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता
मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होश्यार किया
हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्र
शब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया
रक़ीब ओ शेवा-ए-उल्फ़त ख़ुदा की क़ुदरत है
वो और इश्क़ भला तुम ने ए'तिबार किया
ज़बान-ए-ख़ार से निकली सदा-ए-बिस्मिल्लाह
जुनूँ को जब सर-ए-शोरीदा पर सवार किया
तिरी निगह के तसव्वुर में हम ने ऐ क़ातिल
लगा लगा के गले से छुरी को प्यार किया
ग़ज़ब थी कसरत-ए-महफ़िल कि मैं ने धोके में
हज़ार बार रक़ीबों को हम-कनार किया
हुआ है कोई मगर उस का चाहने वाला
कि आसमाँ ने तिरा शेवा इख़्तियार किया
न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर ये कहते हैं
वो बे-क़रार रहे जिस ने बे-क़रार किया
जब उन को तर्ज़-ए-सितम आ गए तो होश आया
बुरा हो दिल का बुरे वक़्त होश्यार किया
फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को इक कहानी थी
कुछ ए'तिबार किया कुछ न ए'तिबार किया
असीरी दिल-ए-आशुफ़्ता रंग ला के रही
तमाम तुर्रा-ए-तर्रार तार तार किया
कुछ आ गई दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे
कुछ आप ने मिरे कहने का ए'तिबार किया
किसी के इश्क़-ए-निहाँ में ये बद-गुमानी थी
कि डरते डरते ख़ुदा पर भी आश्कार किया
फ़लक से तौर क़यामत के बन न पड़ते थे
अख़ीर अब तुझे आशोब-ए-रोज़गार किया
वो बात कर जो कभी आसमाँ से हो न सके
सितम किया तो बड़ा तू ने इफ़्तिख़ार किया
बनेगा मेहर-ए-क़यामत भी एक ख़ाल-ए-सियाह
जो चेहरा 'दाग़'-ए-सियह-रू ने आश्कार किया
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ : मिर्ज़ा ग़ालिब
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआमैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
जम्अ' करते हो क्यूँ रक़ीबों को
इक तमाशा हुआ गिला न हुआ
हम कहाँ क़िस्मत आज़माने जाएँ
तू ही जब ख़ंजर-आज़मा न हुआ
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ
है ख़बर गर्म उन के आने की
आज ही घर में बोरिया न हुआ
क्या वो नमरूद की ख़ुदाई थी
बंदगी में मिरा भला न हुआ
जान दी दी हुई उसी की थी
हक़ तो यूँ है कि हक़ अदा न हुआ
ज़ख़्म गर दब गया लहू न थमा
काम गर रुक गया रवा न हुआ
रहज़नी है कि दिल-सितानी है
ले के दिल दिल-सिताँ रवाना हुआ
कुछ तो पढ़िए कि लोग कहते हैं
आज 'ग़ालिब' ग़ज़ल-सरा न हुआ
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और : मिर्ज़ा ग़ालिब
है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ औरकरते हैं मोहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और
या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
अबरू से है क्या उस निगह-ए-नाज़ को पैवंद
है तीर मुक़र्रर मगर इस की है कमाँ और
तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे
ले आएँगे बाज़ार से जा कर दिल ओ जाँ और
हर चंद सुबुक-दस्त हुए बुत-शिकनी में
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ और
है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता
होते जो कई दीदा-ए-ख़ूँनाबा-फ़िशाँ और
मरता हूँ इस आवाज़ पे हर चंद सर उड़ जाए
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाएँ कि हाँ और
लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का धोका
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और
लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन
करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और
पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले
रुकती है मिरी तब्अ' तो होती है रवाँ और
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश है : मिर्ज़ा ग़ालिब
ज़ुल्मत-कदे में मेरे शब-ए-ग़म का जोश हैइक शम' है दलील-ए-सहर सो ख़मोश है
ने मुज़्दा-ए-विसाल न नज़्ज़ारा-ए-जमाल
मुद्दत हुई कि आश्ती-ए-चश्म-ओ-गोश है
मय ने किया है हुस्न-ए-ख़ुद-आरा को बे-हिजाब
ऐ शौक़ हाँ इजाज़त-ए-तस्लीम-ए-होश है
गौहर को अक़्द-ए-गर्दन-ए-ख़ूबाँ में देखना
क्या औज पर सितारा-ए-गौहर-फ़रोश है
दीदार बादा हौसला साक़ी निगाह मस्त
बज़्म-ए-ख़याल मय-कदा-ए-बे-ख़रोश है
ऐ ताज़ा वारदान-ए-बिसात-ए-हवा-ए-दिल
ज़िन्हार अगर तुम्हें हवस-ए-नाए-ओ-नोश है
देखो मुझे जो दीदा-ए-इबरत-निगाह हो
मेरी सुनो जो गोश-ए-नसीहत-नियोश है
साक़ी-ब-जल्वा दुश्मन-ए-ईमान-ओ-आगही
मुतरिब ब-नग़्मा रहज़न-ए-तम्कीन-ओ-होश है
या शब को देखते थे कि हर गोशा-ए-बिसात
दामान-ए-बाग़बान ओ कफ़-ए-गुल-फ़रोश है
लुफ़्त-ए-ख़िरम-ए-साक़ी ओ ज़ौक़-ए-सदा-ए-चंग
ये जन्नत-ए-निगाह वो फ़िरदौस-ए-गोश है
या सुब्ह-दम जो देखिए आ कर तो बज़्म में
ने वो सुरूर ओ सोज़ न जोश-ओ-ख़रोश है
दाग़-ए-फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब की जली हुई
इक शम' रह गई है सो वो भी ख़मोश है
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में
'ग़ालिब' सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है
हो कर शहीद 'इश्क़ में पाए हज़ार जिस्म
हर मौज-ए-गर्द-ए-राह मिरे सर को दोश है
दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओ : साहिर लुधियानवी
दूर रह कर न करो बात क़रीब आ जाओयाद रह जाएगी ये रात क़रीब आ जाओ
एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की
आज बस में नहीं जज़्बात क़रीब आ जाओ
सर्द झोंकों से भड़कते हैं बदन में शो'ले
जान ले लेगी ये बरसात क़रीब आ जाओ
इस क़दर हम से झिजकने की ज़रूरत क्या है
ज़िंदगी भर का है अब साथ क़रीब आ जाओ
बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा : साहिर लुधियानवी
बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जाटूटा हुआ इक़रार-ए-वफ़ा साथ लिए जा
इक दिल था जो पहले ही तुझे सौंप दिया था
ये जान भी ऐ जान-ए-अदा साथ लिए जा
तपती हुई राहों से तुझे आँच न पहुँचे
दीवानों के अश्कों की घटा साथ लिए जा
शामिल है मिरा ख़ून-ए-जिगर तेरी हिना में
ये कम हो तो अब ख़ून-ए-वफ़ा साथ लिए जा
हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा
जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा
मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर ली : कैफ़ी आज़मी
मिले न फूल तो काँटों से दोस्ती कर लीइसी तरह से बसर हम ने ज़िंदगी कर ली
अब आगे जो भी हो अंजाम देखा जाएगा
ख़ुदा तलाश लिया और बंदगी कर ली
नज़र मिली भी न थी और उन को देख लिया
ज़बाँ खुली भी न थी और बात भी कर ली
वो जिन को प्यार है चाँदी से 'इश्क़ सोने से
वही कहेंगे कभी हम ने ख़ुद-कुशी कर ली
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए : मिर्ज़ा ग़ालिब
दिया है दिल अगर उस को बशर है क्या कहिएहुआ रक़ीब तो हो नामा-बर है क्या कहिए
ये ज़िद कि आज न आवे और आए बिन न रहे
क़ज़ा से शिकवा हमें किस क़दर है क्या कहिए
रहे है यूँ गह-ओ-बे-गह कि कू-ए-दोस्त को अब
अगर न कहिए कि दुश्मन का घर है क्या कहिए
ज़हे करिश्मा कि यूँ दे रक्खा है हम को फ़रेब
कि बिन कहे ही उन्हें सब ख़बर है क्या कहिए
समझ के करते हैं बाज़ार में वो पुर्सिश-ए-हाल
कि ये कहे कि सर-ए-रहगुज़र है क्या कहिए
तुम्हें नहीं है सर-ए-रिश्ता-ए-वफ़ा का ख़याल
हमारे हाथ में कुछ है मगर है क्या कहिए
उन्हें सवाल पे ज़ोम-ए-जुनूँ है क्यूँ लड़िए
हमें जवाब से क़त-ए-नज़र है क्या कहिए
हसद सज़ा-ए-कमाल-ए-सुख़न है क्या कीजे
सितम बहा-ए-मता-ए-हुनर है क्या कहिए
कहा है किस ने कि 'ग़ालिब' बुरा नहीं लेकिन
सिवाए इस के कि आशुफ़्ता-सर है क्या कहिए
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए : साहिर लुधियानवी
न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिएतिरा वजूद है अब सिर्फ़ दास्ताँ के लिए
पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा
वो शाख़ ही न रही जो थी आशियाँ के लिए
ग़रज़-परस्त जहाँ में वफ़ा तलाश न कर
ये शय बनी थी किसी दूसरे जहाँ के लिए
फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरह : सुदर्शन फ़ाकिर
फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आए सवालों की तरहहम परेशाँ ही रहे अपने ख़यालों की तरह
शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-मसीहा ले कर
और हम टूट गए काँच के प्यालों की तरह
जब भी अंजाम-ए-मोहब्बत ने पुकारा ख़ुद को
वक़्त ने पेश किया हम को मिसालों की तरह
ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं
याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह
छलके तिरी आँखों से शराब और ज़ियादा : हसरत जयपुरी
छलके तिरी आँखों से शराब और ज़ियादाखिलते रहें होंठों के गुलाब और ज़ियादा
क्या बात है जाने तिरी महफ़िल में सितमगर
धड़के है दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा
इस दिल में अभी और भी ज़ख़्मों की जगह है
अबरू की कटारी को दो आब और ज़ियादा
तू इश्क़ के तूफ़ान को बाँहों में जकड़ ले
अल्लाह करे ज़ोर-ए-शबाब और ज़ियादा
कोई साग़र दिल को बहलाता नहीं : शकील बदायूनी
कोई साग़र दिल को बहलाता नहींबे-ख़ुदी में भी क़रार आता नहीं
मैं कोई पत्थर नहीं इंसान हूँ
कैसे कह दूँ ग़म से घबराता नहीं
कल तो सब थे कारवाँ के साथ साथ
आज कोई राह दिखलाता नहीं
ज़िंदगी के आइने को तोड़ दो
इस में अब कुछ भी नज़र आता नहीं